कर्मा - सच या मिथ्या?

कभी कभी ज़िन्दगी में इतनी चोट खातें है कि हमें लगने लगता हैं कि दुनिया बहुत अन्यायी है। हम बिना किसी कसूर के चोट खाते रहतें हैं, तो कोई दूसरों के हिस्से की खुशियाँ छीनकर मुस्कुरा रहा होता है। ऐसे में हम अक्सर सोचते है कि क्या सच में कोई न्याय व्यवस्था है? इसका सीधा और अटल जवाब है: हाँ, कर्म नाम की एक ताक़त होती है, और यह उतनी ही सच है जितनी साँस लेने की प्रक्रिया।

मैंने एक टीवी शो में कर्मा के बारे में सुना था कि सीधा सीधा कुछ नहीं होता जीवन में। एक उदाहरण देखिए - एक आदमी बगीचे से गुजरते वक्त आम के पेड़ को देखा जिसमे बहुत सारे आम थे। उसे आम खाने का मन हुआ, यूकी आँख वहां चल नहीं सकता तो गया उसके पांव। पांव आम को तोड़ नहीं सकता तो तोड़ा उसके हाथ ने और खाया उसके मुँह ने। अब मुंह में वो आम को रख नहीं सकता तो रखा उसके पेट ने। ये सब देखा माली ने और मार खाई उसके पीठ ने, जबकि पीठ का इस पूरे कांड से कोई लेना देना नहीं था। जब मार खाई तो आंसू आई उसके आंखों से, क्योंकि इस पूरे कांड की शुरुआत आँख न की थी, उसी ने आम को देखा था। जिसने शुरू की थी उसी को भुगतना पड़ा। इसीलिए कहते है कि कर्मा सच है।

यह दुनिया का सबसे बुनियादी नियम है—क्रिया और प्रतिक्रिया का नियम (Law of Cause and Effect)। जो बोयेंगे वही पाएंगे। जो बीज आज आप मिट्टी में दबाएंगे, कल पेड़ उसी का उगेगा; बबूल बोकर आम की उम्मीद करना सिर्फ इंसान का भ्रम हो सकता है, कुदरत का नहीं।

कई बार लोग कर्म पर इसलिए शक करने लगते हैं क्योंकि इसका हिसाब तुरंत नहीं दिखता। हम इंस्टेंट डिलीवरी और तुरंत नतीजों की दुनिया में रहते हैं, जहाँ हर चीज़ का बटन दबाते ही जवाब चाहिए। लेकिन कुदरत की अपनी घड़ी होती है। कर्म की चक्की भले ही धीमी चलती है, मगर वह पीसती बेहद ज़ोर से है। किसी के साथ बेईमानी करना, पीठ पीछे वार करना, या किसी का दिल दुखाना भले ही उस पल आसान लगे, पर वह ऊर्जा कहीं खोती नहीं। कहते है ना, दुखी मन की हाय किसी बद्दुआ से कम नहीं होती। वह समय के किसी अनदेखे मोड़ पर लौटकर ठीक उसी दरवाज़े पर दस्तक देती है, जहाँ से वह निकली थी।

यही बात अच्छाई पर भी लागू होती है। जब आप किसी की निस्वार्थ मदद करते हैं, किसी टूटते हुए इंसान को हौसला देते हैं या बिना किसी दिखावे के किसी के चेहरे पर मुस्कान लाते हैं, तो वह नेकी कभी व्यर्थ नहीं जाती। जब ज़िंदगी आपको ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर देगी जहाँ सब रास्ते बंद लगेंगे, तब वही अनजान अच्छाई किसी न किसी रूप में आपका हाथ थाम लेगी।

कर्मा हमें यह एहसास दिलाता है कि हमारा हर विचार, हर शब्द और हर कदम एक गूंज की तरह है, जो लौटकर हमारे पास ही आएगी। इसलिए हिसाब-किताब की चिंता छोड़िए, नफ़रत का जवाब नफ़रत से देने के बजाय अपने हिस्से की रोशनी फैलाइए। दुनिया को जो देंगे, अंत में वही आपके खाते में दर्ज होगा।



Reyhana K.

Assistant Professor of Management Studies

Al Shifa College of Arts and Science, Keezhattur, Perinthalmanna.

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